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1 नवंबर से नहीं चलेगी 150 साल पुरानी ‘श्रमिक ट्रेन’, 31 को होगा आख‍िरी सफर

डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी ‘श्रमिक ट्रेन’ पहली नवंबर से बंद हो जाएगी। रेलवे ने ट्रेनों की समय सारिणी में बदलाव के साथ यह भी एक महत्वप...

डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पुरानी ‘श्रमिक ट्रेन’ पहली नवंबर से बंद हो जाएगी। रेलवे ने ट्रेनों की समय सारिणी में बदलाव के साथ यह भी एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। यह ट्रेन जमालपुर से कजरा और जमालपुर से सुलतांगज के बीच मंगलवार तक ही चलेगी। मालदा डिवीजन के एक बड़े अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है। मालूम हो कि जमालपुर में रेलवे का एशिया प्रसिद्ध कारखाना है, जहां अब डीजल इंजन का निर्माण और मरम्मत का काम होता है। यह 8 फरवरी 1862 में अंग्रेजों ने स्थापित किया था। बताते है कि यहां ब्रिटिश शासन में पहले तोपों का निर्माण किया जाता था। यह आयुध कारखाना था। बाद में रेलवे इंजन के निर्माण कारखाना के रूप में अंग्रेजों ने ही तब्दील किया था। उसी समय से कारखाने में काम करने वाले श्रमिकों की सहूलियत के लिए इन दो रूटों पर ट्रेनें चलाई थीं। दिलचस्प है कि इसी वजह से इन दोनों ट्रेन का नाम श्रमिक ट्रेन पड़ा।

बता दें कि इन ट्रेनों से आवाजाही के लिए दूसरे मुसाफिरों को कोई अनुमति नहीं है। यह केवल रेलवे श्रमिकों को अपने घर से ड्यूटी पर आने जाने के लिए है। इसी कारण इन दोनों रूट की ट्रेनों का टिकट नहीं कटता है। लेकिन आमतौर पर इनमें दूसरे मुसाफिर भी सफर करते हैं। गाहे-बगाहे टिकट चेकिंग हुई तो ये लोग बेटिकट मिलते हैं। हालांकि, श्रमिक ट्रेन बंद करने की रेलवे ने कोई वजह नहीं बताई है और ना ही इस फैसले के खिलाफ कोई विरोध की आवाज उठी है। लेकिन रेलवे कर्मचारियों को दिक्कत तो होनी तय है। कारखाने में काम करने वाले विजय शर्मा बताते हैं कि अब कर्मचारियों को दूसरी मुसाफिर ट्रेनों पर निर्भर रहना होगा।

इस रूट पर दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव रेलवे ने मालदा-जमालपुर एक्सप्रेस इंटरसिटी ट्रेन को पहली नवंबर से जमालपुर तक ही चलाने का फैसला कर किया है। पहले भी यह ट्रेन मालदा-जमालपुर के बीच ही चलती थी। लेकिन जुलाई 2015 से इसे जमालपुर के बाद पैसेंजर ट्रेन बना क्युल स्टेशन तक चलाया जाने लगा। नतीजतन समय से चलने वाली ट्रेन की पहचान खटारा ट्रेन की बन गई थी। मसलन इसके क्युल से जमालपुर आने के तय समय से काफी बिलंब से पहुंचती थी। रेलवे के इस फैसले को सभी ने सराहा है। वहीं, लंबी दूरी की ट्रेनों में एक से दस मिनट का बदलाव किया गया है, जोकि सामान्य बात है।
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