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इंटरनेशनल कोर्ट में जज की नियुक्ति पर भारत का पलड़ा भारी, आज होगा आखिरी फैसला

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र में भारत और ब्रिटेन के बीच अब नाक की लड़ाई बन गया है. बीते एक ...

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीशों का चुनाव संयुक्त राष्ट्र में भारत और ब्रिटेन के बीच अब नाक की लड़ाई बन गया है. बीते एक सप्ताह से चल रही कवायद और कई दौर की वोटिंग में अब तक भारत का पलड़ा भारी है. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश पद के लिए भारत के जस्टिस दलबीर भंडारी और ब्रिटेन के जज क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के बीच टक्टर चल रही है.

गत 9 नवंबर से 13 नवंबर के बीच हुए 6 दौर के मतदान में ब्रिटिश जज को एक भी बार महासभा में बहुमत नहीं मिल सका वहीं भारत के जस्टिस भंडारी हर दौर में आगे रहे. गत 13 नवंबर को हुई छठे दौर की वोटिंग में जस्टिस भंडारी को महासभा में 121 मत हासिल हुए जबकि ग्रीनवुड को महज 68 वोट ही हासिल हो सके. हालांकि सुरक्षा परिषद के मतदान में ग्रीनवुड का पलड़ा कुछ भारी रहा और उन्हें जस्टिस भंडारी को हासिल 5 मतों के मुकाबले 9 वोट मिले. सुरक्षा परिषद में भी रूस और फ्रांस जैसे मुल्कों ने भारत के पक्ष में मतदान किया.

इस चुनाव के लिए अब सोमवार को न्यूयॉर्क में निर्णायक दौर का मतदान होना है. हालांकि इस मतदान से पहले ब्रिटेन ने ज्वाइंट कांफ्रेस के जरिए फैसले को लेकर लामबंदी शुरू कर दी है. यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सीधे मतदान की बजाए सुरक्षा परिषद और महासभा के तीन-तीन सदस्यों की एक बैठक में बहुमत से फैसला किया जाने का प्रावधान है.

महत्वपूर्ण बात यह कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनावों के लिए मौजूद इस प्रावधान का आज तक इस्तेमाल बीते 70 से अधिक सालों में कभी भी नहीं किया गया. ब्रिटेन का यह पैंतरा बताता है कि वो सीधे मुकाबले से मैदान छोड़ अपनी जगह बचाने का गलियारा तलाश रहा है. उसकी कोशिश सुरक्षा परिषद में लामबंदी के सहारे बीते सात दशकों से चली आ रही अपनी जगह बचाने की है.

इस बीच ब्रिटेन की इस कवायद के मुकाबले भारतीय खेमा भी ताल ठोंक कर अखाड़े में जमा है क्योंकि भारत के पास संयुक्त राष्ट्र महासभा में मिले समर्थन का दम है. सूत्रों के मुताबिक ब्रिटेन अगर ज्वाइंट कांफ्रेंस के जरिए चुनाव की मांग रखता है तो भारत इसका मुखर विरोध भी करेगा. भारत की दलील है कि दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत में बहुसंख्य सदस्यों का समर्थन औऱ लोकतांत्रिक मूल्यों का तकाजा है कि महासभा में बहुमत हासिल करने वाले उम्मीदवार का ही चयन किया जाए.
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